Thursday, 18 February 2016

भारतीय राजव्यवस्था

संविधान की प्रस्तावना

प्रस्तावना संविधान के लिए एक परिचय के रूप में कार्य करती है। 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा इसमें संशोधन किया गया था जिसमें तीन नए शब्द समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता को जोड़ा गया था। संविधान की प्रस्तावना का निर्माण भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य करने के लिए किया गया। यह भारत के सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता को सुरक्षित करती है और लोगों के बीच भाई चारे को बढावा देती है।

भारतीय संसद

भारत संघ की सर्वोच्च विधायी अंग को संसद कहा जाता है। भारतीय संविधान हमें एक संसदीय लोकतंत्र प्रदान करता है, भारत की संसद देश के शासन में प्रमुख स्थान रखती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79– 122 में भारत के संसद की संरचना, शक्तियां और प्रक्रियाओं के बारे में उल्लेख किया गया है। राज्यसभा में सीटों का आवंटन चौथी अनुसूची में निहित प्रावधानों के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों द्वारा पूरा किया जाना है।

संसदीय मंच (पार्लियामेंट्री फोरम)

संसदीय मंचों के गठन का उद्देश्य हैः कार्यान्वयन प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए परिणामोन्मुख दृष्टिकोण के साथ महत्वपूर्ण मुद्दों पर नोडल मंत्रालयों के संबंधित मंत्रियों, विशेषज्ञों और प्रमुख अधिकारियों के साथ सदस्यों के बातचीत और चर्चा के लिए मंच उपलब्ध कराना। चिंता के प्रमुख क्षेत्रों के साथ–साथ जमीनी हकीकत के बारे में सदस्यों को जागरुक बनाना और उन्हें नवीनतम जानकारी, ज्ञान, तकनीकी अनुभव और देश एवं विदेश दोनों ही के विशेषज्ञों से महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करना ताकि सदन और अन्य संसदीय समितियों की बैठक में वे इन मुद्दों को प्रभावशाली तरीके से पेश कर सकें।

सहकारी समितियां

सहकारी समितियां स्वैच्छिक सहयोग का एक रूप हैं| अनुच्छेद 19 के अनुसार सहकारी समितियों का गठन करना एक मूल अधिकार है और नीति निर्देशक तत्वों का अनुच्छेद 43(ब) सहकारी समितियों के विकास को बढावा देता है| सहकारी समिति व्यक्तियों की एक ऐसी स्वायत्त संस्था है जो संयुक्त स्वामित्व वाले और लोकतांत्रिक आधार पर नियंत्रित उद्यम के जरिए अपनी समान्य, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वेच्छा से एकजुट होते हैं।

संसदीय समितियां

संसद को जटिल और विविध प्रकार के कार्य करने होते हैं। सदन द्वारा गठित/ निर्वाचित या स्पीकर या अध्यक्ष द्वारा मनोनीत समति को संसदीय समिति कहा जा सकता है; इसमें लोकसभा/ राज्यसभा द्वारा उपलब्ध कराया गया सचिवालय होता है। एक संसदीय समिति स्थायी समिति या तदर्थ समिति हो सकती है। स्थायी समितियां स्थिर समितियां होती हैं और इनका गठन निश्चित अवधि के लिए किया जाता है।

योजना आयोग और नीति आयोग

योजना आयोग पंचवर्षीय योजनाओं को तैयार करने वाली भारत सरकार की गैर संवैधानिक और गैर– वैधानिक संस्था थी। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस आयोग के स्थान पर सामाजिक और आर्थिक मुद्दों की सलाहकार निकाय, नीति आयोग का गठन कर दिया है। नीति आयोग, केंद्र और राज्य सरकारों के लिए रणनीतिक एवं तकनीकी सलाह प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए योजना आयोग का स्थान लेने वाली एक गतिशील संस्था है।

भारत में संसदीय प्रणाली

भारत में सरकार की एक संसदीय प्रणाली है। अनुच्छेद 74 और अनुच्छेद 75 केंद्र में संसदीय प्रणाली और अनुच्छेद 163 और 164 राज्यों में संसदीय प्रणाली के बारे में है। संसदीय प्रणाली के कई गुण हैं और राष्ट्रपति प्रणाली के मुकाबले कई लाभ भी। सरकार की लोकतांत्रिक प्रणाली को कार्यपालिका और विधायिका के बीच के रिश्तों के आधार पर संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली में बांटा जा सकता है। संसदीय प्रणाली में कार्यकारी विधायिका के हिस्से होते हैं जो कानून को लागू करने और उसे बनाने में सक्रिए भूमिका निभाते हैं।

भारत का प्रधानमंत्री कार्यालय

प्रधानमंत्री कार्यालय की महत्वता और इसकी जिम्मेदारियों की वजह से चर्चित है। इसलिए बड़ी जिम्मेदारी के निष्पादन के लिए उसे प्रधानमंत्री के कार्यालय द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। इसे सचिवीय सहायता प्रदान करने के अनुच्छेद 77 (3) के प्रावधान के तहत एक निर्मित प्रशासनिक एजेंसी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसकी शुरूआत 1947 में प्रधानमंत्री पद के सचिव के रूप में हुयी थी तत्पश्चात् 1977 में पुर्न: नामित कर इसका नाम प्रधानमंत्री कार्यालय रखा गया।

भारत के प्रधानमंत्री

789 संविधान की अनुच्छेद 74 (1) में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता करने तथा उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगा जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा, राष्‍ट्रपति इस मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार अपने कार्यों का निष्‍पादन करेगा। इस प्रकार वास्‍तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद् में निहित होती है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है।

भारत में निर्वाचन प्रक्रिया

निर्वाचन भारतीय लोकतान्त्रिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संविधान में अनुच्छेद 324 से लेकर 329 तक भारतीय निर्वाचन प्रणाली की रुपरेखा प्रस्तुत की गयी है। संवैधानिक प्रावधानों व संसद द्वारा बनाये गए कानूनों के के अनुसार भारत में लोक सभा, राज्य सभा, राज्य विधान सभाओं व विधान परिषदों के लिए निर्वाचन संपन्न कराये जाते हैं। निर्वाचन, संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से अनुपूरित संवैधानिक उपबंधों के अनुसार ही संचालित किए जाते है। मुख्य कानून हैं लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, जो मुख्यत: निर्वाचक नामावलियों की तैयारी तथा पुनरीक्षण से संबंधित है।

दबाव समूह

दबाव समूह, एक ऐसा संरचित समूह है जिसका लक्ष्य आम आदमी से संबधित हितों के लिए सरकारी, सार्वजनिक नीति को प्रभावित करना या आम लोगों से संबंधित एक विशेष कारण की रक्षा करना है। दबाव समूह सरकार और लोगों के बीच एक कड़ी के रूप में काम करते हैं। दबाव समूह की कई विशेषताएं हैं और दबाव समूहों के अनेक प्रकार होते हैं।

जम्मू और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा

भारत के संविधान का अनुच्छेद 370 जम्मू और कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देता है। पाकिस्तान के हमला करने के डर के बीच जम्मू और कश्मीर का उसके स्वयं पर अधिकार बनाए रखते हुए, भारत में जल्दबाजी में शामिल हो गया था। हालांकि, कई पैमाने हैं जिनके तहत जम्मू और कश्मीर को विशेष लाभ दिए गए हैं। इस राज्य का अपना अलग संविधान और अपना राष्ट्रीय ध्वज भी है।

कुछ वर्गों से संबंधित विशेष प्रावधान

अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, एंग्लो– इंडियन और पिछड़ी जातियों के हितों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 330 से 342 में विशेष प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 330 और 332 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण के बारे में है। अनुच्छेद 330 लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में ऐसी जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या वहां की जनसंख्या के आधार पर होती है।

मौलिक अधिकार

संविधान के भाग III- भारत के नागरिकों को कुछ बुनियादों अधिकारों की गारंटी देता है मौलिक अधिकारों के रूप में जाना जाता है जो संविधान के प्रावधानों के अधीन और न्यायोचित हैं। मौलिक अधिकारों को छ भागों में विभाजित किया गया है जिनमें, संवैधानिक उपचारों का अधिकार, स्वतंत्रतता का अधिकार, शोषण के खिलाफ अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार और संवैधानिक उपचारों का अधिकार शामिल हैं।

मौलिक कर्तव्य

42वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा हमारे वर्तमान संविधान के भाग 4 में मौलिक कर्तव्य शामिल किये थे। वर्तमान में अनुच्छेद 51 A के तहत हमारे संविधान में 11 मौलिक कर्तव्य हैं जो कानून द्वारा वैधानिक कर्तव्य हैं और प्रवर्तनीय भी हैं। मौलिक अधिकारों को स्थापित करने के पीछे का उद्देश्य नागरिकों द्वारा अपने मौलिक अधिकारों का आदान-प्रदान कर अपने कर्तव्यों के दायित्वों पर जोर देकर उनका आनंद उठाना था।

याचिका (रिट) और उनका विषय क्षेत्र

एक रिट अथवा याचिका का अर्थ है –आदेश,  यानि वह कुछ भी जिसे एक अधिकार के तहत जारी किया जाता है वह याचिका है, और इसे रिट के रूप में जाना जाता है। अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत भारतीय संविधान के तीसरे भाग में प्रदत्त मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए भारत का संविधान उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को अधिकार प्रदान करता है।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951

संविधान के अनुच्छेद 327 के तहत इस अधिनियम को संसद द्वारा पारित किया गया था। यह संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव का संचालन प्रदान करता है। यह इन बातों की भी पुष्टि करता है कि उक्त सदनों का सदस्य बनने के लिए क्या योग्यताएं और अयोग्यताएं होती हैं। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (4) कहती है कि कोई भी जनप्रतिनिधि किसी भी मामले में दोषी ठहराए जाने की तिथि से तीन महीने की तिथि तक और अगर दौरान वो अपील दायर करता है तो उसका निबटारा होने तक अपने पद के अयोग्य घोषित नहीं होगा।

संविधान बनने से पहले पारित हुए अधिनियम

भारत में संविधान निर्माण से पहले ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न कानूनों और अधिनयमों को पारित कर दिया था।  इन नियमों पर भारतीय समाज के अलग-अलग हिस्सों से विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आयी थी और भारतीय राजनीतिक प्रणाली तैयार करने में इन कानूनों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकिअंत में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने भारत में ब्रिटिश शासन को समाप्त कर दिया और 15 अगस्त1947 को भारत को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में घोषित कर दिया गया।

निचली अदालतें या अधीनस्थ न्यायालय

जिला और अधीनस्थ अदालतें उच्च न्यायालय के तहत आती हैं। इन अदालतों का प्रशासन क्षेत्र भारत में जिला स्तर का होता है। जिला अदालत सभी अधीनस्थ अदालतों के उपर लेकिन उच्च न्यायालय के नीचे होती हैं। जिले का क्षेत्राधिकार जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पास होता है। सिविल मामलों का संचालन करते हुए जिला जज और आपराधिक केसों के न्याय का संचालन करते समय उसे सत्र न्यायाधीश कहा जाता है। राज्य सरकार द्वारा मेट्रोपोलिटन के रुप में मान्यता प्राप्त शहर या इलाके की जिला अदालत में अध्यक्षता करने पर उसे मेट्रोपोलिटन सत्र न्यायाधीश के तौर पर संबोधित किया जाता है।

राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा

केंद्र सरकार उन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा देती है जिनके इलाके दुर्गम होते हैं। साथ ही प्रदेश का एक खास क्षेत्र इंटरनैशनल सीमा से लगा हो। वह क्षेत्र देश की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है। ज्यादातर पहाड़ी राज्यों को विशेष राज्य दर्जा मिला है। फिलहाल भारत में 28 राज्यों में से 11 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा मिला है। इसमें पूर्वोंत्तर के लगभग सभी राज्य हैं।

राज्य सूचना आयोग

राज्य सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और दस राज्य सूचना आयुक्तों होते हैं। जिनकी नियुक्ति एक समिति की सिफारिश के बाद राज्यपाल द्वारा की जाती है। इस समिति का अध्यक्ष, राज्य का मुख्यमंत्री होता है तथा इसमें राज्य विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष और मुख्यमंत्री द्वारा नामित राज्य का एक कैबिनेट मंत्री शामिल होता है। इस पद पर नियुक्त होने वाले व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन में श्रेष्ठतम् व्यक्ति होना चाहिए और उसके पास लाभ का कोई अन्य पद नहीं होना चाहिए तथा वह किसी भी राजनीतिक दल के साथ या किसी भी व्यापार या किसी पेशे से नहीं जुड़ा हुआ होना चाहिए।

राज्य वित्त आयोग

अनुच्छेद 280 के तहतकेंद्र के वित्त आयोग की तर्ज पर 1993 से भारत के सभी राज्यों में राज्य वित्त आयोग की स्थापना की गयी थी जिसका उद्देश्य पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करना होता है। राज्य वित्त आयोग के निम्न कार्य हैं, राज्य में स्थित विभिन्न पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों की आर्थिक स्थिति की समीक्षा करना। राज्य में स्थित विभिन्न नगर निकायों और पंचायती राज्य संस्थाओं की वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए विभिन्न कदम उठाना।

भारत में पंचायती राज व्यवस्था

पंचायत भारतीय समाज की बुनियादी व्यवस्थाओं में से एक रहा है। जैसा कि हम सब जानते हैं, महात्मा गांधी ने भी पंचायतों और ग्राम गणराज्यों की वकालत की थी। स्वतंत्रता के बाद से, समय– समय पर भारत में पंचायतों के कई प्रावधान किए गए और 1992 के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के साथ इसको अंतिम रूप प्राप्त हुआ।

भारत की राजभाषायें

भारतीय संविधान में विभिन्न संस्थानों से व्यवहार करने के लिए अलग– अलग भाषाएं हैं यानि संघ की भाषा, क्षेत्रीय भाषाएं, न्यायिक भाषा और विधि एवं विशेष निर्देशों की भाषा। यद्यपि, इस संविधान के शुरु होने से लेकर आने वाले पंद्रह वर्ष की अवधि तक, अंग्रेजी भाषा का प्रयोग संघ के सभी राजकीय उद्देश्यों के लिए किया जाना जारी रहेगा जैसा कि इसका प्रयोग पहले किया जा रहा था।

राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था (नीति आयोग)

भारत सरकार को समाजिक और आर्थिक मुद्दों पर सलाह देने के लिए योजना आयोग का स्थान लेने वाला थिंक टैंक या मंच है नीति आयोग या राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था। भारत के प्रधानमंत्री बतौर अध्यक्ष आयोग के प्रमुख हैं।1 जनवरी 2015 को योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग का गठन किया गया था। यह भारत सरकार को सामाजिक एवं आर्थिक मुद्दों पर परामर्श देगा।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भारत में मानवाधिकारों की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार सांविधिक निकाय है। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 कहता है कि आयोग " संविधान या अंतरराष्ट्रीय संविदा द्वारा व्यक्ति को दिए गए जीवन, आजादी, समानता और मर्यादा से संबंधित अधिकारों" का रक्षक है। एनएचआरसी में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं। अध्यक्ष को भारत का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए ।

भारतीय संविधान की विशेषताएं

संविधान, किसी भी देश का मौलिक कानून है जो सरकार के विभिन्न अंगों की रूपरेखा और मुख्य कार्य का निर्धारण करता है। साथ ही यह सरकार और देश के नागरिकों के बीच संबंध भी स्थापित करता है। वर्तमान में, भारत का संविधान 465 अनुच्छेद जो 25 भागों और 12 अनुसूचियों में लिखित है। हालांकि, संविधान की कई विशेषताएं हैं जैसे धर्मनिरपेक्ष राज्य, संघवाद, संसदीय सरकार इत्यादि ।

आपातकालीन प्रावधान

भारत में आपातकालीन प्रावधान जर्मनी के संविधान से उधार लिए गए हैं। भारत के संविधान में निम्नलिखित तीन प्रकार की आपात स्थिति की परिकल्पना की गई हैः
(i) अनुच्छेद 352– राष्ट्रीय आपातकाल, अनुच्छेद (ii) 356– राज्य में आपातकाल (राष्ट्रपति शासन), (iii) अनुच्छेद 360– वित्तीय आपातकाल
इस तीनों ही आपातकालीन स्तिथियों को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के आदेश पर लागू करता है । अनुच्छेद 352 के तहत, अगर राष्ट्रपति युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर देश की सुरक्षा के लिए पैदा हुई स्थिति को गंभीर मानें तो देश में आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं।

भारत में चुनाव सुधार

भारत में बेहतर लोकतंत्र, स्वच्छ राजनीति, विधायी सदनों के आदर्श सदस्यों, प्रतिनिधित्व की समानता और ऐसी ही अन्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए निर्वाचन प्रक्रियाओं में विकास और बदलाव हेतु चुनाव सुधार देखें। अनुच्छेद 324– 329 चुनावों और चुनाव सुधार के बारे में हैं। भारत निर्वाचन आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है जो राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों में चुनावों का संचालन करता है।

हिन्दी भाषा में संविधान की विषय वस्तु

हिन्दी भाषा में संविधान के प्राधिकृत विषय वस्तु के साथ अनुच्छेद 394 कार्यवाही करता है।हिन्दी भाषा में संविधान के प्राधिकृत विषय वस्तु के साथ अनुच्छेद 394कार्यवाही करता है। संविधान में हिंदी भाषा की कोई भी प्राधिकृत विषय वस्तु प्रदान नहीं की गयी है। 58 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1987 ने संविधान के XXII भाग में अनुच्छेद 394-ए को शामिल किया है।

राज्य के नीति निर्देशक तत्व

राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक में शामिल किया गया है| राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का उद्देश्य नीति निर्माताओं के सामने कुछ सामाजिक व आर्थिक लक्ष्यों को प्रस्तुत करना था ताकि वृहत्तर सामाजिक आर्थिक समानता की दिशा में देश में सामाजिक बदलाव लाये जा सकें| सर्वोच्च न्यायालय ने भी राज्य के नीति निर्देशक तत्वों से सम्बंधित कुछ निर्णय दिए है|

संविधान का बुनियादी ढांचा (सिद्धांत)

भारतीय संविधान की मूल संरचना (या सिद्धांत), केवल संवैधानिक संशोधनों पर लागू होती है जो यह बताती है कि संसद, भारतीय संविधानके  बुनियादी ढांचे को नष्ट या बदल नहीं सकती है। संविधान की मूल संरचना (सिद्धांत) के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय के कई महत्वपूर्ण निर्णय रहे हैं। संविधान, संसद और राज्य विधान मंडलों या विधानसभाओं को उनके संबंधित क्षेत्राधिकार के भीतर कानून बनाने का अधिकार देता है।

भारतीय निर्वाचन आयोग

चुनाव, भारतीय लोकतंत्र के मुख्य आधार का निर्माण करते हैं| भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में निर्वाचन आयोग का प्रावधान किया गया है जो भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से चुनाव सम्पन्न कराने वाली शीर्ष संस्था है ताकि चुनाव प्रक्रिया में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित किया जा सके|  भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में संसद, राज्य विधानमंडल के साथ साथ राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनावों के अधीक्षण,निर्देशन और निर्वाचन नामावलियों की तैयारी पर नियंत्रण रखने के लिए निर्वाचन आयोग का प्रावधान किया गया है |

दलबदल विरोधी कानून

संविधान के दलबदल विरोधी कानून के संशोधित अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 का संबंध संसद तथा राज्य विधानसभाओं में दल परिवर्तन के आधार पर सीटों से छुट्टी और अयोग्यता के कुछ प्रावधानों के बारे में है। दलबदल विरोधी कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची जोड़ा गया है जिसे संविधान के 52वें संशोधन के माध्यम से वर्ष 1985 में पारित किया गया था। इस कानून में विभिन्न संवैधानिक प्रावधान थे और इसकी विभिन्न आधारों पर आलोचना भी हुयी थी।

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण

संविधान का भाग XIV-क अधिकरण प्रदान करता है। प्रावधान को 1976 के 42 वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से जोड़ा गया। अनुच्छेद 323 क और 323 ख क्रमश: अन्य मामलों से संबंधित प्रशासनिक न्यायाधिकरण अथवा अधिकरण और अधिकरण प्रदान करते हैं। संसद द्वारा 1985 में पारित प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण और राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण की स्थापना के लिए केंद्र सरकार को अधिकृत करता है।

जिला कलेक्टर/मजिस्ट्रेट

जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर जिले का मुख्य कार्यकारी,प्रशासनिक और राजस्व अधिकारी है।वह जिले में कार्य कर रहीं विभिन्न सरकारी एजेंसियों के मध्य आवश्यक समन्वय की स्थापना करता है।  इस पद का सृजन 1772 में वारेनहेस्टिंग्स ने किया था। जिला मजिस्ट्रेट का मुख्य सामान्य प्रशासन का निरीक्षण करना, भूमि राजस्व वसूलना और जिले में कानून-व्यवस्था को बनाये रखना है। वह राजस्व संगठनों का प्रमुख होता था। वह भूमि के पंजीकरण,जोतों के के विभाजन ,विवादों के निपटारे दिवालिया जागीरों के प्रबंधन ,कृषकों को ऋण देने और सूखा राहत के लिए भी जिम्मेदार था।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय

अनुच्छेद 124 (1) के तहत भारतीय संविधान निर्दिष्ट करता है कि भारत में सर्वोच्च न्यायालय में भारत का मुख्य न्यायधीश तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश को मिलाकर 31 न्यायाधीश होने चाहिए| उच्चतम न्यायलय की स्थापना, गठन, अधिकारिता, शक्तियों के विनिमय से सम्बंधित विधि निर्माण की शक्ति भारतीय संसद को प्राप्त है| इसके न्यायधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा होती है| उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित नहीं की गयी है परन्तु अवकाश ग्रहण की आयु सीमा 65 वर्ष है|

संघ लोक सेवा आयोग

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 315 संघों व राज्यों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर लोक सेवकों की नियुक्ति करता है| संघ लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक निकाय है। संघ लोक सेवा आयोग में एक अध्यक्ष और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त अन्य सदस्य शामिल होते हैं। आयोग का अध्यक्ष व सदस्य छह साल की अवधि के लिए (राष्ट्रपति द्वारा चयनित) या 65 वर्ष की आयु पाने तक, जो भी पहले हो, कार्यरत रहते हैं|

राज्य लोक सेवा आयोग

भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने प्रांतीय स्तर पर लोक सेवा आयोग की स्थापना की जिसे राज्य लोक सेवा आयोग के रूप में जाना जाता है तथा भारत के संविधान ने इसे स्वायत्त निकायों के रूप में संवैधानिक दर्जा दिया है| एक राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) में एक अध्यक्ष और राज्य के राज्यपाल द्वारा नियुक्त किए गए अन्य सदस्य शामिल होते हैं। नियुक्त सदस्यों में से आधे सदस्यों को भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य की सरकार के तहत कार्यालय में कम से कम दस साल के लिए कार्यरत होना चाहिए|

राज्य मानवाधिकार आयोग

मानव संरक्षण अधिकार अधिनियम (1993), के आधार पर राज्य स्तर पर राज्य मानवाधिकार आयोग बना है। एक राज्य मानवाधिकार आयोग भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची और समवर्ती सूची के अंतर्गत शामिल विषयों से संबंधित मानव अधिकारों के उल्लंघन की जांच कर सकता है। मानव अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2006  में एक अध्यक्ष के साथ तीन सदस्य शामिल होते हैं। अध्यक्ष, उच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए। आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है।

राज्यपाल

अनुच्छेद 153 के तहत प्रत्येक राज्य का राज्यपाल होना चाहिए / राज्य के कार्यकारी के तहत राज्यपाल, मंत्रियों की परिषद और राज्य के महाधिवक्ता होते हैं। राज्यपाल भी राज्य का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है जो अपने कार्य संबंधित राज्य के मंत्रियों की परिषद की सलाह के अनुसार करता है| इस के अलावा, राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर दोहरी भूमिका निभाता है| इसकी नियुक्ति राष्ट्रपति के आदेश पर पांच वर्षों के लिए की जाती है परन्तु वह राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त ही पाने पद पर रह सकता है|

भारत में नागरिकता

नागरिकता राज्य के एक सदस्य होने के रूप में कानून के तहत मान्यता प्राप्त एक व्यक्ति की स्थिति है| हालांकि, 1955 का नागरिकता अधिनियम तथा इसके संशोधन संविधान के प्रारम्भ होंने के बाद नागरिकता के अधिग्रहण और समाप्ति के साथ संबंध रखते हैं| इसके अलावा, संविधान ने विदेशों में रेह रहे भारतियों (OCI’s) तथा अनिवासी भारतीय नागरिक (NRI’s) और भारतीय मूल के लोगों (PIO’s) को नागरिकता के अधिकार प्रदान किए हैं|

भारत का महान्यायवादी

अनुच्छेद 76 और 78 भारत के महान्यायवादी के साथ संबन्धित है| भारत के महान्यायवादी देश का सर्वोच्च कानून अधिकारी होता है। वह सभी कानूनी मामलों में सरकार की सहायता के लिए जिम्मेदार होता है। राष्ट्रपति, महान्यायवादी की नियुक्त करता है| जो व्यक्ति (महान्यायवादी) नियुक्त किया जाता है उसकी योग्यता सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश होने लायक होनी चाहिए।  वह भारत का नागरिक होना चाहिए और दस साल के लिए उच्च न्यायलय में वकील के रूप में कार्य करने का अनुभव होना चाहिए|

संविधान संशोधन

संशोधन एक राष्ट्र या राज्य के लिखित संविधान के पाठ में औपचारिक परिवर्तन को दर्शाता है। संविधान के संशोधन अत्यधिक जीवन की वास्तविकता को प्रतिबिंबित करने के लिए संविधान को संशोधित करने और मार्गदर्शन करने के लिए आवश्यक है। संविधान में संशोधन कई प्रकार से किया जाता है नामतः साधारण बहुमत, विशेष बहुमत तथा बहाली कम से कम आधे राज्यों द्वारा| अनुच्छेद 368 के तहत संवैधानिक संशोधन, भारतीय संविधान की एक मूल संशोधन प्रक्रिया है।

राज्य के महाधिवक्ता

अनुच्छेद 165 राज्य के महाधिवक्ता और अनुच्छेद 177 सदनो के सम्मान में मंत्रियों तथा महाधिवक्ता के अधिकारों के साथ संबंध रखता है। महाधिवक्ता राज्य का सर्वोच्च कानून अधिकारी होता है। वह सभी कानूनी मामलों में राज्य सरकार की सहायता के लिए जिम्मेदार है। वह राज्य सरकार के हितों का बचाव और रक्षा करता है| राज्य के महाधिवक्ता का कार्यालय भारत के अटॉर्नी जनरल के कार्यालय से समान होता है |

संविधान के महत्वपूर्ण अनुच्छेदों की सूची

भारत ने अपना संविधान 26 नवम्बर 1949 में अपनाया था । जब यह संविधान अपनाया गया था उस समय इसमें 395 अनुच्छेद 22 भाग और 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में भारत के संविधान में 465 अनुच्छेद 25 भाग और 12 अनुसूचियां हैं । संविधान के कुल अनुच्छेदों में से 15 अर्थात 5,6,7,8, 9, 60, 324, 366, 367, 372, 380, 388, 391, 392  तथा 393 को 26 नवम्बर 1949 को ही लागू कर दिया था, जबकि शेष अनुच्छेदों को 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया  था ।

संघ-राज्य संबंध / केंद्र-राज्य संबंध

भारत, राज्यों का एक संघ है। भारत के संविधान को विधायपालिका, कार्यपालिका और केंद्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय शक्तियों में विभाजित किया गया है, जो संविधान को संघीय विशेषता प्रदान करता है जबकि न्यायपालिका एक श्रेणीबद्ध संरचना में एकीकृत है। भाग XI में अनुच्छेद 245-255 केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंधों के विभिन्न पहलुओं का आदान-प्रदान करता है। संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को सुरक्षित करने के लिए विभिन्न प्रावधान तय किए गए हैं।

मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यकारी होता है, राज्यपाल के अधीनस्थ अधिकारियों के बीच में वह सरकार का एक मुखिया होता है। उसकी स्थित/पद एक राज्य में वही होता है जो देश में प्रधानमंत्री का होता है। हमारे संविधान में एक मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त होने वाली विशेषताओं का स्पष्ट रूप से वर्णन नहीं किया गया है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 167 के तहत राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्रियों की राज्य परिषद के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है।

मंत्रिमंडलीय समितियां

मंत्रिमंडल की स्थायी समितियों जिनका पुनर्गठन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है । इन समितियों में, मंत्रिमंडल की समिति (एसीसी, आवास पर मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीए), आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए), संसदीय मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति, राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीपीए), और सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) इत्यादि आते हैं। इन समितियों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं। गृह मंत्री और मंत्री के प्रभारी संबंधित मंत्रालय इस समिति के सदस्य होते हैं।

भारतीय संविधान सभा

भारतीय संविधान सभा एक संप्रभु ढांचा था जिसका गठन कैबिनेट मिशन की सिफारिश पर किया गया था जिसने देश के लिए एक संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए 1946 में भारत का दौरा किया था। भारत के लिए एक संवैधानिक मसौदा तैयार करने के लिए डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में एक मसौदा समिति का गठन किया गया था। हालांकि, बाद में संविधान सभा को अपने गठन के बाद कुछ आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा था।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक

अनुच्छेद 148 भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से संबंधित है जो केंद्र और राज्य स्तर पर पूरे देश की वित्तीय व्यवस्था प्रणाली को नियंत्रित/समीक्षा करता है। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा स्वयं अपने हाथों मुहर युक्त अधिपत्र द्वारा 6 वर्ष के लिए की जाती है। अपना पद ग्रहण करने से पहले कैग (सीएजी) तीसरी अनुसूची में अपने प्रयोजन के लिए निर्धारित प्रपत्र के अनुसार, राष्ट्रपति के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञा लेते हैं।

न्यायिक समीक्षा और न्यायिक सक्रियता

न्यायिक समीक्षा का अर्थ है- एक कानून या आदेश की समीक्षा और वैधता निर्धारित करने के लिए न्यायपालिका की शक्ति को प्रर्दशित करना। दूसरी ओर, न्यायिक सक्रियता इस बात को संदर्भित करती है कि न्यायिक शक्ति का उपयोग मुखर और लागू होने से क्या इसका लाभ बडे पैमाने पर सामान्य लोगों और समाज को मिला पा रहा है कि नहीं। विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों के व्यापक अधिकार क्षेत्र के साथ भारत की एक स्वतंत्र न्यायपालिका है।

केंद्रीय सूचना आयोग

केंद्रीय सूचना आयोग एक संवैधानिक संस्था नहीं है, लेकिन एक स्वतंत्र निकाय है जो सरकार और केंद्र शासित प्रदेशों के तहत आने वाले कार्यालयों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, वित्तीय संस्थाओं आदि से संबंधित शिकायतों और अपीलों पर गौर करती है या देख-रेख करती है। सूचना के अधिकार अधिनियम (2005) के प्रावधानों के तहत केंद्रीय सूचना आयोग की स्थापना 2005 में भारत सरकार द्वारा की गयी थी। केंद्रीय सूचना आयोग शासन की प्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

केंद्रीय सतर्कता आयोग

केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) एक शीर्ष भारतीय निकाय है जिसकी स्थापना 1964 में केंद्र सरकार के तहत सरकारी भ्रष्टाचार की पहचान व सतर्कता निगरानी करने के लिए और केंद्र सरकार की संस्थाओं में योजना बनाने, क्रियान्वित करने तथा उनकी सतर्कता की समीक्षा करने में विभिन्न अधिकारियों को सलाह देने के लिए की गयी थी। इसे एक स्वायत्त निकाय का दर्जा प्राप्त है। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। इस पद का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है।

केंद्रीय जांच (अन्वेषण) ब्यूरो

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में कार्य करती है। यह भारत में सबसे अग्रणी जांच करने वाली पुलिस एजेंसी है और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए प्रमुख आपराधिक जांचों में शामिल रहती है। हालांकिसीबीआई को कुछ आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है। सीबीआई का एक निदेशक होता है जो एक आईपीएस अधिकारी होता है जिसका रैंक पुलिस महानिदेशक या पुलिस आयुक्त (राज्य) के समकक्ष होता है। निदेशक की नियुक्ति दो वर्ष की अवधि के लिए की जाती है।

माउंटबेटन योजना और भारत के विभाजन

लॉर्ड माउंटबेटन, भारत के विभाजन और सत्ता के त्वरित हस्तांतरण के लिए भारत आये। प्रारम्भ में यह सत्ता हस्तांतरण विभाजित भारत की भारतीय सरकारों को डोमिनियन के दर्जे के रूप में दी जानी थीं। 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी योजना प्रस्तुत की जिसमे भारत की राजनीतिक समस्या को हल करने के विभिन्न चरणों की रुपरेखा प्रस्तुत की गयी थी। प्रारम्भ में यह सत्ता हस्तांतरण विभाजित भारत की भारतीय सरकारों को डोमिनियन के दर्जे के रूप में दी जानी थीं।

कैबिनेट मिशन प्लान

22 जनवरी को कैबिनेट मिशन को भेजने का निर्णय लिया गया था और 19 फरवरी, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री सी.आर.एटली की सरकार ने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कैबिनेट मिशन के गठन और भारत छोड़ने की योजना की घोषणा की| तीन ब्रिटिश कैबिनेट सदस्यों का उच्च शक्ति सम्पन्न मिशन,जिसमे भारत सचिव लॉर्ड पैथिक लारेंस, बोर्ड ऑफ़ ट्रेड के अध्यक्ष सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और नौसेना प्रमुख ए.वी.अलेक्जेंडर शामिल थे, 24 मार्च,1946 को दिल्ली पहुँचा|

अराजक और रिवोल्यूशनरी अपराध अधिनियम, 1919

गवर्नर जनरल चेम्सफोर्ड ने 1917 में जस्टिस सिडनी रौलट की अध्यक्षता में एक समिति गठित की| इस समिति का गठन विद्रोह की प्रकृति को समझने और सुझाव देने के लिए किया गया था| इसे ‘रौलट समिति’ के नाम से भी जाना जाता है| इस अधिनियम, जोकि किसी भी क्षेत्र/भाग पर लागू किया जा सकता था, में किसी भी व्यक्ति को कार्यपालिका के नियंत्रण में लाने के लिए दो तरह के उपाय शामिल थे- दंडात्मक और प्रतिबंधात्मक| इस अधिनियम के तहत सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती थी और बिना सुनवाई के दो साल तक कैद में रख सकती थी|

संवैधानिक सभा

कैबिनेट मिशन योजना के तहत 16 मई 1946 को संविधान सभा का गठन किया गया|इसके सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के तहत एकल हस्तान्तरणीय मत प्रणाली द्वारा किया गया था| संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को दिल्ली कौंसिल चैंबर के पुस्तकालय में हुई थी जिसमे 205 सदस्यों ने भाग लिया था|लीग के प्रतिनिधि और रियासतों द्वारा नामित सदस्य इसमें शामिल नहीं हुए| 11 दिसंबर को सभा ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को इसके स्थायी अध्यक्ष के रूप में चुना|

अंतरिम सरकार

2 सितम्बर 1946, को नवनिर्वाचित संविधान सभा ने भारत की अंतरिम सरकार का गठन किया जोकि 15 अगस्त 1947 तक अस्तित्व में बनी रही|अंतरिम सरकार की कार्यकारी शाखा का कार्य वायसराय की कार्यकारी परिषद करती थी जिसकी अध्यक्षता वायसराय द्वारा की जाती थी| अगस्त 1946 में कांग्रेस ने अंतरिम सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया ताकि ब्रिटिश सरकार के लिए सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को सरल बनाया जा सके| अंतरिम सरकार ने 2 सितम्बर 1946 से कार्य करना आरम्भ किया|

बेवल योजना और शिमला सम्मलेन

लॉर्ड लिनलिथगो के स्थान पर अक्टूबर,1943 में लॉर्ड वेबेल को गवर्नर जनरल के रूप में नियुक्त किया गया| लॉर्ड वेबेल ने उस समय के भारत में उपस्थित गतिरोध को दूर करने के लिए प्रयास किया| उन्होंने 14 जून को भारतीय राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए ब्रिटिश सरकार के एक प्रस्ताव, जिसे वेबेल योजना कहा गया, को भारतीय जनता के लिए जारी किया|यह उस समय भारत में उपस्थित राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए तैयार किया गया था लेकिन मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेताओं के बीच समझौता न हो पाने के कारण उन्होंने प्रस्ताव का बहिष्कार कर दिया और अंततः शिमला सम्मलेन में प्रस्ताव समाप्त हो गया|

देसाई-लियाकत प्रस्ताव (AD 1945)

महात्मा गाँधी ये मान चुके थे कि जब तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग देश के भविष्य या अंतरिम सरकार के गठन को लेकर किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच जाती तब तक ब्रिटिश शासक देश को स्वतंत्रता प्रदान नहीं करेंगे। केंद्रीय सभा में कांग्रेस के नेता देसाई और लियाकत अली ने बैठककर केंद्र में अंतरिम सरकार के गठन हेतु प्रस्ताव तैयार किया। देसाई-लियाकत प्रस्ताव मुस्लिम लीग के नेताओं को संतुष्ट करने और 1942-1945 के राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का एक प्रयास था।

राजगोपालाचारी फार्मूला (1944 ई.)

द्विराष्ट्र सिद्धांत और ब्रिटिशों से भारत की स्वतंत्रता को लेकर मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलग अलग विचारों के कारण पैदा हुए मतभेदों को सुलझाने के उद्देश्य से राजगोपालाचारी फार्मूला लाया गया था| सी.राजगोपालाचारी, जोकि कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता थे, ने मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच के राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए एक फार्मूला तैयार किया| यह फार्मूला, जिसे महात्मा गाँधी का समर्थन प्राप्त था, वास्तव में लीग की पाकिस्तान मांग की मौन स्वीकृति थी|

सुभाषचंद्र बोस और आई. एन. ए. (आजाद हिन्द फ़ौज)

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान स्वतंत्रता संघर्ष के विकास में आजाद हिन्द फ़ौज के गठन और उसकी गतिविधियों का महत्वपूर्ण स्थान था|इसे इन्डियन नेशनल आर्मी या आईएनए के नाम से भी जाना जाता है| रास बिहारी बोस नाम के भारतीय क्रांतिकारी,जो कई सालों से भारत से भागकर जापान में रह रहे थे, ने दक्षिण पूर्व एशिया में रह रहे भारतीयों के सहयोग से इन्डियन इन्डिपेंडेंस लीग का गठन किया|

भारत छोड़ो आन्दोलन

अप्रैल 1944 में क्रिप्स मिशन के असफल होने के लगभग चार महीने बाद ही स्वतंत्रता के लिए भारतीयों का तीसरा जन आन्दोलन आरम्भ हो गया| इसे भारत छोड़ो आन्दोलन के नाम से जाना गया| 8 अगस्त, 1942 को बम्बई में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया| इस प्रस्ताव में यह घोषित किया गया था कि अब भारत में ब्रिटिश शासन की तत्काल समाप्ति भारत में स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र की स्थापना के लिए अत्यंत जरुरी हो गयी है|

क्रिप्स मिशन

सर स्टैफोर्ड क्रिप्स,जो वामपंथी लेबर दल के सदस्य थे और जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का सक्रिय समर्थन किया था,ने क्रिप्स मिशन की अध्यक्षता की थी|यह मिशन द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की ओर से ब्रिटिशों को पूर्ण समर्थन पाने के लिए लाया गया गया था| ब्रिटिश, भारत में वास्तविक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना करने के इच्छुक नहीं थे| उन्होंने रजवाड़ों के हितों को बढावा देने का भी प्रयास किया| हालाँकि उन्होंने संविधान सभा की मांग स्वीकार ली थी लेकिन इस बात पर जोर दिया कि सभा में भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व रजवाड़ों द्वारा नामित सदस्यों के द्वारा किया जाये और राज्यों की जनता का इसमें कोई प्रतिनिधितित्व न हो|

व्यक्तिगत सत्याग्रह

व्यक्तिगत सत्याग्रह अगस्त प्रस्ताव का परिणाम था| इसका प्रारंभ जन सविनय अवज्ञा आन्दोलन के रूप में हुआ था लेकिन महात्मा गाँधी ने इसे व्यक्तिगत सत्याग्रह में बदल दिया| यह आन्दोलन केवल स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए ही नहीं था बल्कि इसमें अभिव्यक्ति के अधिकार को भी दृढ़तापूर्वक प्रस्तुत किया गया|इसमें सत्याग्रही की मांग युद्ध-विरोधी घोषणा के माध्यम से युद्ध का विरोध करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करने की थी|यदि सत्याग्रही को सरकार द्वारा गिरफ्तार नहीं किया जाता है तो वह गांवों से होते हुए दिल्ली की ओर मार्च करेगा (“दिल्ली चलो आन्दोलन)|

अगस्त प्रस्ताव

भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को शिमला से एक वक्तव्य जारी किया,जिसे अगस्त प्रस्ताव कहा गया|यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य को लेकर पूछे गए सवाल के जबाव में लाया गया था| यह भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा जारी किया गया औपचारिक वक्तव्य था, जिसने संविधान निर्माण प्रक्रिया की नींव रखी और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की|

साम्प्रदायिक अधिनिर्णय और पुना समझौता

सांप्रदायिक अधिनिर्णय ब्रिटिश भारत में उच्च जातियों,निम्न जातियों,मुस्लिमों,बौद्धों,सिखों,भारतीय ईसाईयों,आंग्ल-भारतियों,यूरोपियों,और अछूतों (जिन्हें अब दलितों के रूप में जाना जाता है) के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था प्रदान करने के लिए लाया गया था| इसे ‘मैकडोनाल्ड अवार्ड’ के रूप में भी जाना जाता है| देश में लगभग सभी जगह जनसभाएं आयोजित की गयीं ,मदनमोहन मालवीय,बी.आर.अम्बेडकर और एम.सी.रजा जैसे विभिन्न धडों के नेता सक्रिय हो गए| इसका अंत एक समझौते के रूप में हुआ जिसे ‘पूना समझौता’ के रूप में जाना गया|

नेहरू रिपोर्ट

नेहरु रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है| इस रिपोर्ट ने अमेरिका के अधिकार पत्र से प्रेरणा ग्रहण की,जिसने भारत के संविधान में मूल अधिकारों सम्बन्धी प्रावधानों की आधारशिला रखी थी|12फरवरी,1928 को डॉ.एम.ए.अंसारी की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय सम्मलेन बुलाया गया जिसमे 29 संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे|इस सम्मलेन का आयोजन भारत सचिव लॉर्ड बिर्केन्हेड की चुनौती और साइमन आयोग के प्रत्युत्तर में किया गया था|

साइमन कमीशन

साइमन आयोग का गठन सर जॉन साइमन के नेतृत्व में भारत में संवैधानिक प्रणाली की कार्यप्रणाली की जांच करने और उसमे बदलाव हेतु सुझाव देने के लिए किया गया था|इसका औपचारिक नाम ‘भारतीय संविधायी आयोग’ था और इसमें ब्रिटिश संसद के दो कंजरवेटिव,दो लेबर और एक लिबरल सदस्य शामिल थे|आयोग का कोई भी सदस्य भारतीय नहीं था|इसीलिए उनके भारत आगमन का स्वागत ‘साइमन वापस जाओ’ के नारे के साथ किया गया था|विरोध प्रदर्शन को शांत करने के लिए वायसराय लॉर्ड इरविन ने अक्टूबर 1929 में भारत को ‘डोमिनियन’ का दर्जा देने की घोषणा की|

बटलर समिति (1927 ई.)

भारतीय राज्य समिति ने सर हार्टकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में 1927 में एक समिति गठित की,जिसे बटलर समिति भी कहा जाता है| इस समिति का गठन परमसत्ता और देशी राजाओं के बीच के संबंधों की जांच और स्पष्टीकरण के लिया किया गया था| इसके गठन के उद्देश्य परमसत्ता और भारतीय राजाओं के मध्य के संबंधों की जाँच करना और उनके मध्य के इन संबंधों की बेहतरी के लिए सुझाव देना था ताकि ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के बीच संतोषजनक संबंधों की स्थापना की जा सके|

मुडीमैन समिति (1924)

भारतीय नेताओं की मांगों को पूरा करने और 1920 के दशक के आरंभिक वर्षों में स्वराज पार्टी द्वारा स्वीकृत किये गए प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने सर अलेक्जेंडर मुडीनमैन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की| समिति में ब्रिटिशों के अतिरिक्त चार भारतीय सदस्य भी शामिल थे| भारतीय सदस्यों में सर शिवास्वामी अय्यर,डॉ.आर.पी.परांजपे,सर तेज बहादुर सप्रे और मोहम्मद अली जिन्ना शामिल थे| इस समिति ने शाही आयोग/रॉयल कमीशन की नियुक्ति की सिफारिश की| भारत सचिव लॉर्ड बिर्केनहेड ने कहा कि बहुमत/बहुसंख्यक की रिपोर्ट के आधार पर कदम उठाये जायेंगे|

स्वराज दल

स्वराज पार्टी ने स्वयं को कांग्रेस का ही अभिन्न अंग एवं अहिंसा व असहयोग का खुले आम समर्थन किया| बल्लभभाई पटेल,मदनमोहन मालवीय और  एम.एस.जयकर जैसे कांग्रेस नेताओं का इसे सक्रिय सहयोग मिला था| जब असहयोग आन्दोलन प्रारंभ हुआ था तो उस समय विधायिकाओं के बहिष्कार का निर्णय लिया गया था| चितरंजन दास,मोतीलाल नेहरु और विट्ठलभाई पटेल के नेतृत्व वाले एक गुट का मानना था कि कांग्रेस को चुनाव में भाग लेना चाहिए और विधायिकाओं के अन्दर पहुँचकर उनके काम को बाधित किया जाना चाहिए| वल्लभभाई पटेल,सी.राजगोपालाचारी और राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व वाले गुट ने इसका विरोध किया|

खिलापत और असहयोग आन्दोलन

1919 ई. में मोहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधुओं के नाम से प्रसिद्ध),मौलाना अबुल कलाम आज़ाद,हसरत मोहानी व कुछ अन्य के नेतृत्व में तुर्की के साथ हुए अन्याय के विरोध में खिलाफत आन्दोलन चलाया गया| इस आन्दोलन के संचालन के लिए बनी खिलाफत समिति में महात्मा गाँधी भी शामिल थे| तुर्की के सुल्तान को खलीफा अर्थात मुस्लिमों का धर्मगुरु भी माना जाता था|अतः तुर्की के साथ हुए अन्याय के मुद्दे को लेकर जो आन्दोलन शुरू हुआ,उसे ही खिलाफत आन्दोलन कहा गया|

जलियाँवाला बाग

जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने ब्रिटिशों के अमानवीय चेहरे को सामने ला दिया | ब्रिटिश सैनिकों ने एक लगभग बंद मैदान में हो रही जनसभा में एकत्रित निहत्थी भीड़ पर,बगैर किसी चेतावनी के, जनरल डायर के आदेश पर गोली चला दी क्योकि  वे प्रतिबन्ध के बावजूद जनसभा कर रहे थे| 13 अप्रैल 1919 को यहाँ एकत्रित यह भीड़ दो राष्ट्रीय नेताओं –सत्यपाल और डॉ.सैफुद्दीन किचलू ,की गिरफ्तारी का विरोध कर रही थी| अचानक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी जनरल डायर ने अपनी सेना को निहत्थी भीड़ पर, तितर-बितर होने का मौका दिए बगैर, गोली चलाने के आदेश दे दिए और 10 मिनट तक या तब तक गोलियां चलती रहीं जब तक वे ख़त्म नहीं हो गयीं|

रौलट विरोधी सत्याग्रह

रौलट विरोधी सत्याग्रह के दौरान,महात्मा गाँधी ने कहा कि “यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि हम मुक्ति केवल संघर्ष के द्वारा ही प्राप्त करेंगे न कि अंग्रेजों द्वारा हमें प्रदान किये जा रहे सुधारों से”|13अप्रैल,1919 को घटित जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ,रौलट विरोधी सत्याग्रह ने अपनी गति खो दी|यह आन्दोलन प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों और बिना ट्रायल के कैद में रखने के विरोध में था| रौलट एक्ट ब्रिटिशों को बंदी प्रत्यक्षीकरण के अधिकार को स्थगित करने सम्बन्धी शक्तियां प्रदान करता था| इसने राष्ट्रीय नेताओं को चिंतित कर दिया और उन्होंने इस दमनकारी एक्ट के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन प्रारंभ कर दिए|

होमरूल आन्दोलन

“होमरूल” शब्द आयरलैंड के एक ऐसे ही आन्दोलन से लिया गया था जिसका सर्वप्रथम प्रयोग श्यामजी कृष्ण वर्मा  ने 1905 में लन्दन में किया था| लेकिन इसका सार्थक प्रयोग करने का श्रेय बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट  को है| भारत में दो होमरूल लीगों की स्थापना की गयी,जिनमे से एक की स्थापना बाल गंगाधर तिलक ने अप्रैल 1916 में पूना में की थी और दूसरी की स्थापना एनी बेसेंट ने सितम्बर 1916 में मद्रास में की थी|

स्वदेशी आन्दोलन

स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत बंगाल विभाजन के विरोध में हुई थी और इस आन्दोलन की औपचारिक शुरुआत कलकत्ता के टाउन हॉल में 7 अगस्त ,1905 को एक बैठक में की गयी थी| इसका विचार सर्वप्रथम कृष्ण कुमार मित्र के पत्र संजीवनी में 1905 ई. में प्रस्तुत किया गया था| इस आन्दोलन में स्वदेशी नेताओं ने भारतियों से अपील की कि वे सरकारी सेवाओं,स्कूलों,न्यायालयों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करें और स्वदेशी वस्तुओं को प्रोत्साहित करें व राष्ट्रीय कोलेजों व स्कूलों की स्थापना के द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा को प्रोत्साहित करें |अतः ये केवल राजनीतिक आन्दोलन ही नहीं था बल्कि आर्थिक आन्दोलन भी था|

मुस्लिम लीग की स्थापना

बंगाल के विभाजन ने सांप्रदायिक विभाजन को भी जन्म दे दिया| 30 दिसंबर,1906 को ढाका के नवाब आगा खां और नवाब मोहसिन-उल-मुल्क  के नेतृत्व में भारतीय मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा के लिए मुस्लिम लीग का गठन किया गया| मुस्लिम लीग के गठन को प्रोत्साहित करने वाले कारक निम्न थे-ब्रिटिश योजना,शिक्षा का अभाव,मुस्लिमों की संप्रभुता का पतन,धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति,भारत का आर्थिक पिछड़ापन | मुस्लिम लीग के गठन का मुख्य उद्देश्य मुस्लिमों में अन्य समुदायों के प्रति विरोध भाव को कम करना था|

1861 का अधिनियम

भारतीय परिषद् अधिनियम-1861 का निर्माण देश के प्रशासन में भारतीयों को शामिल करने के उद्देश्य से बनाया गया था|इस अधिनियम ने सरकार की शक्तियों और कार्यकारी व विधायी उद्देश्य हेतु गवर्नर जनरल की परिषद् की संरचना में बदलाव किया| यह प्रथम अवसर था जब गवर्नर जनरल की परिषद् के सदस्यों को अलग-अलग विभाग सौंपकर विभागीय प्रणाली की शुरुआत की| इस अधिनियम ने सरकार की शक्तियों और कार्यकारी व विधायी उद्देश्य हेतु गवर्नर जनरल की परिषद् की संरचना में बदलाव किया|

उग्रपंथ और बंगाल विभाजन

उग्रपंथियों का राजनीतिक उदय कांग्रेस के अन्दर ही बंगाल विभाजन विरोधी प्रदर्शनों से हुआ था|जब ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के लोगों द्वारा किये जा रहे जन प्रदर्शनों के बावजूद बंगाल के विभाजन को रद्द करने से मना कर दिया तो अनेक युवा नेताओं का सरकार से मोहभंग हो गया ,इन्हें ही नव-राष्ट्रवादी या उग्रपंथी कहा गया| लाला लाजपत राय,बाल गंगाधर तिलक,बिपिन चंद्र पाल और अरविन्द घोष प्रमुख उग्रपंथी नेता थे|उन्हें उग्रपंथी कहा गया क्योकि उनका मानना था कि सफलता केवल उग्र माध्यमों से ही प्राप्त की जा सकती है|

उदारवादी

उदारवादियों ने 1885-1905 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर अपना प्रभुत्व बनाये रखा| वे थे तो भारतीय लेकिन वास्तव में अपनी पसंद,बुद्धि,विचार और नैतिकता के मामले में ब्रिटिश थे|वे धैर्य,संयम,समझौतों और सभाओं में विश्वास रखते थे| ए.ओ.ह्यूम,डब्लू.सी.बनर्जी,सुरेन्द्रनाथ बनर्जी,दादाभाई नैरोजी,फिरोजशाह मेहता,गोपालकृष्ण गोखले,पंडित मदन मोहन मालवीय,बदरुद्दीन तैय्यब जी,जस्टिस रानाडे,जी.सुब्रमण्यम अय्यर आदि राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रथम चरण के नेता थे|

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 से 30 दिसंबर 1885 के मध्य बम्बई में तब हुई जब भारत की विभिन्न प्रेसीडेंसियों और प्रान्तों के 72 सदस्य बम्बई में एकत्र हुए| भारत के सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी एलेन ओक्टोवियन ह्युम ने कांग्रेस के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी|

भारतीय प्रेस का विकास

1780 ई. में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने ‘बंगाल गजट’ या ‘कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर’ पत्र शुरू किया जिसे 1872 ई. में सरकार की स्पष्ट आलोचना करने के कारण जब्त कर लिया गया| लेकिन हिक्की के इस प्रयास ने भारत में प्रेस की स्थापना की | बाद में अनेक समाचार पत्र और जर्नल प्रकाशित हुए,जैसे- बंगाल जर्नल,कलकत्ता क्रोनिकल,मद्रास कोरियर और बॉम्बे हेराल्ड|

शिक्षा का विकास

प्रारंभ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी शिक्षा प्रणाली के विकास के प्रति गंभीर नहीं थी क्योकि उनका प्राथमिक उद्देश्य व्यापार करना और लाभ कमाना था| भारत में शासन करने के लिए उन्होंने उच्च व मध्यम वर्ग के एक छोटे से हिस्से को शिक्षित करने की योजना बनायीं ताकि एक ऐसा वर्ग तैयार किया जाये जो रक्त और रंग से तो भारतीय हो लेकिन अपनी पसंद और व्यवहार के मामले में अंग्रेजों के समान हो और सरकार व जनता के बीच आपसी बातचीत को संभव बना सके|

1857 का विद्रोह (कारण और असफलताए)

1857 का विद्रोह उत्तरी और मध्य भारत में ब्रिटिश अधिग्रहण के विरुद्ध उभरे सैन्य असंतोष व जन-विद्रोह का परिणाम था| इस विद्रोह ने भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के शासन को समाप्त कर दिया और अगले 90 वर्षों के लिए भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग को ब्रिटिश सरकार (ब्रिटिश राज) के प्रत्यक्ष शासन के अधीन लाने का रास्ता तैयार कर दिया| इस विद्रोह के – सामाजिक और धार्मिक, आर्थिक,सैन्य और राजनीतिक –चार मुख्य कारण थे|

ब्रिटिश शासन में सामाजिक अधिनियम

19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिशों की नीतियों ने हालाँकि तत्कालीन सामाजिक समाज में व्याप्त बुराइयों के उन्मूलन में सहयोग दिया लेकिन धीरे-धीरे भारत की सामाजिक-धार्मिक बुनावट को कमजोर करने का कार्य भी किया क्योकि वे मुख्यतः अंग्रेजी सोच व समझ पर आधारित थीं| प्राच्यवाद के व्याख्याताओं ने कहा कि भारतीय समाज को आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण की आवश्यकता है| उन्हें (बुराइयों) अनेक विचारधाराओं की तीव्र आलोचना का सामना करना पड़ा| विलियम विल्बरफोर्स व चार्ल्स ग्रांट जैसे व्यक्तियों के अनुसार ‘भारतीय समाज अंधविश्वासों,मूर्ति पूजा व पुजारियों की तानाशाही से भरा पड़ा है|’

दक्षिण भारत में सधार

बंगाल से शुरू होकर धार्मिक व सामाजिक सुधार आन्दोलन भारत के अन्य भागों में भी फैल गए| ब्रहम समाज से प्रेरित होकर 1864 ई. में मद्रास में वेद समाज की स्थापना की गयी| इसने जातिगत भेदभाव का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह व स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित किया| ब्रहम समाज के समान,वेद समाज ने भी अंधविश्वासों व हिन्दू धर्म के रूढ़िवादी रीति-रिवाजों का विरोध किया और एक परमसत्ता में विश्वास व्यक्त किया| वेद समाज के सबसे प्रमुख नेता चेम्बेती श्रीधरालू नायडू थे|

पश्चिमी भारत में सुधार आन्दोलन

सन1867 ई. में बम्बई में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई| महादेव गोविन्द रानाडे और रामकृष्ण भंडारकर इसके मुख्य संस्थापक थे| प्रार्थना समाज के नेता ब्रहम समाज से प्रभावित थे| उन्होंने जाति-प्रथा और छुआछुत के व्यवहार का विरोध किया| रानाडे, जोकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भी संस्थापकों में से एक थे,ने 1887 ई. में इंडियन नेशनल सोशल कांफ्रेंस  की स्थापना की जिसका उद्देश्य संपूर्ण भारत में सामाजिक सुधार के लिए प्रभावशाली तरीके से कार्य करना था|

थिओसोफिकल समाज

‘थिओसोफी’ सभी धर्मों में निहित आधारभूत ज्ञान है लेकिन यह प्रकट तभी होता है जब वे धर्म अपने-अपने अन्धविश्वासों से मुक्त हो| वास्तव में यह एक दर्शन है जो जीवन को बुद्धिमत्तापूर्वक प्रस्तुत करता है और हमें यह बताता है की ‘न्याय’ तथा ‘प्यार’ ही वे मूल्य है जो संपूर्ण विश्व को दिशा प्रदान करते है| इसकी शिक्षाएं,बिना किसी बाह्य परिघटना पर निर्भरता के, मानव के अन्दर छुपी हुई आध्यात्मिक प्रकृति को उद्घाटित करती हैं|

सय्यद अहमद खान और अलीगढ़ आन्दोलन

सर सैय्यद अहमद खान भारत के महानतम मुस्लिम सुधारकों में से एक थे|उन्होंने आधुनिक तर्कवाद व विज्ञान के प्रकाश में कुरान की व्याख्या की| उन्होंने धर्मान्धता,संकीर्ण मानसिकता व कट्टरपन का विरोध किया और स्वतंत्र सोच को बढावा देने पर बल दिया| उनका सबसे बड़ा योगदान 1875 ई. में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज की स्थापना था| समय के साथ यह भारतीय मुस्लिमों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थान बन गया| यह मानविकी व विज्ञान के विषयों से सम्बंधित शिक्षा को पूरी तरह से अंग्रेजी माध्यम में प्रदान करता था और इसके कई अध्यापक इंग्लैंड से भी आये थे|

मुस्लिम सुधर आन्दोलन

19 वीं सदी के आरम्भ में मुस्लिम उद्बोधन के चिन्ह उत्तर प्रदेश में बरेली के सर सैय्यद अहमद खां और बंगाल के शरीयतुल्ला के नेतृत्व में उभरकर सामने आये, ऐसा ईसाई मिशनरियों,पश्चिमी विचारों के प्रभाव और आधुनिक शिक्षा के कारण संभव हो सका| उन्होंने स्वयं को इस्लाम के शुद्धिकरण व उसे मजबूत बनाने और इस्लामिक शिक्षाओं के प्रोत्साहन के लिए समर्पित कर दिया था| शरीयतुल्ला ने बंगाल के फरायजी आंदोलन की शुरुआत की,जिसने कृषकों के हित में कई कदम उठाये थे|उन्होंने मुस्लिम समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था|

रामकृष्ण और विवेकानंद

19 वीं सदी के धार्मिक मानवों ने न तो किसी सम्प्रदाय का समर्थन किया और न ही मोक्ष का कोई नया रास्ता दिखलाया| उन्होंने ईश्वरीय चेतना का सन्देश दिया| उनके अनुसार ईश्वरीय चेतना के आभाव में परम्पराएँ रूढ़ और दमनात्मक हो जाती है और धार्मिक शिक्षाएं अपनी परिवर्तनकारी शक्ति को खोने लगती है| 19 वीं सदी में भारत के ईश मानव रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद थे| रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का दर्शन धार्मिक सौहार्द्र पर आधारित था और इस सौहार्द्र का अनुभव व्यक्तिगत ईश्वरीय चेतना के आधार पर ही किया जा सकता है|

ईश्वरचंद विद्यासागर

सामाजिक सुधार आन्दोलन, जो देश के सभी भागों और सभी धर्मों तक विस्तृत था, वास्तव में धार्मिक सुधार आन्दोलन भी था| महान विद्वान और सुधारक विद्यासागर के विचारों में भारतीय और पश्चिमी मूल्यों का सुन्दर समन्वय था| वे उच्च नैतिक मूल्यों में विश्वास करते थे और निर्धनों के प्रति उदार भाव से सम्पन्न एक महान मानववादी विचारक थे| उनकी महान शिक्षाओं के लिए कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज,जिसके वे कुछ वर्षों के लिए प्रिंसिपल रहे थे,ने उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की|

डेजेरियो और यंग बंगाल

1820 के दशक अंतिम समय और 1830 के दशक प्रारंभ में बंगाल के युवाओं में एक उग्र/क्रांतिकारी,प्रबुद्ध और बुद्धिजीवी चलन का उदय हुआ जिसे ‘यंग बंगाल आन्दोलन’ के नाम से जाना गया| एक युवा आंग्ल-भारतीय,हेनरी विवियन डेरेजियो,जिन्होनें 1826 से लेकर 1831 तक हिन्दू कॉलेज में अध्यापन किया था,इस प्रगतिशील आन्दोलन के नेता और प्रेरक थे| डेरेजियो ने कलकत्ता के युवाओं को व्यवहारिक रूप से प्रभावित किया और उनके बीच एक बौद्धिक आन्दोलन की शुरुआत की|

राममोहन रॉय और ब्रह्म समाज

सामाजिक और धार्मिक जीवन के कुछ पहलुओं के सुधार से प्रारंभ होने वाला जागरण ने समय के साथ देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और  राजनीतिक जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित किया|18वीं सदी के उत्तरार्ध में कुछ यूरोपीय और भारतीय विद्वानों ने प्राचीन भारतीय दर्शन,विज्ञान,धर्म और साहित्य का अध्ययन प्रारंभ किया| इस अध्ययन के द्वारा भारतीय अपने प्राचीन भारतीय ज्ञान से परिचित हुए,जिसने उनमें अपनी सभ्यता के प्रति गौरव का भाव जाग्रत किया|

भारत सरकार अधिनियम - 1935

भारत सरकार अधिनियम-1935  में यह अधिकथित था कि,यदि आधे भारतीय राज्य संघ में शामिल होने के लिए सहमत होते है तो, भारत को एक संघ बनाया जा सकता है| इस स्थिति में उन्हें केंद्रीय विधायिका के दोनों सदनों में अधिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया जायेगा, लेकिन संघ से सम्बंधित प्रावधानों को लागू नहीं किया जा सका| इस अधिनियम में स्वतंत्रता की बात तो दूर , भारत को डोमिनियन का दर्जा देने की भी कोई चर्चा नहीं की गयी थी क्योकि  इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य भारत सरकार को ब्रिटिश सम्राट के अधीन लाना था|

मोंटेंग्यु-चेम्सफोर्ड सुधार अर्थात भारत सरकार अधिनियम-1919

मोंटेंग्यु-चेम्सफोर्ड सुधार अर्थात भारत सरकार अधिनियम-1919  द्वारा भारत में प्रांतीय द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना की गयी |यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें प्रांतीय विषयों को दो भागों- आरक्षित और हस्तांतरित में बांटा गया था,आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर अपने द्वारा मनोनीत पार्षदों के माध्यम से करता था और हस्तांतरित विषयों का प्रशासन निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता था|इन सुधारों द्वारा केंद्रीय विधान-मंडल को द्विसदनीय बना दिया गया |इनमें से एक सदन को राज्य परिषद् और दुसरे सदन को केंद्रीय विधान सभा कहा गया |दोनों सदनों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत था|

1909 ई. का भारतीय परिषद् अधिनियम

1909 ई. के भारत शासन अधिनियम को ,भारत सचिव और वायसराय के नाम पर, मॉर्ले-मिन्टो सुधार भी कहा जाता है|इसका निर्माण उदारवादियों को संतुष्ट करने के लिए किया गया था| लॉर्ड मिन्टो को ‘सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल का पिता’ कहा जाता है क्योकि उन्होंने इन सुधारों के माध्यम से ‘प्रथक निर्वाचन मंडल ‘ के सिद्धांत का प्रारंभ किया | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1909 ई. के अपने अधिवेशन में इस अधिनियम के अन्य सुधारों का तो स्वागत किया लेकिन धर्म के आधार पर प्रथक निर्वाचक मंडलों की स्थापना के प्रावधान का विरोध किया|

1892 ई. का अधिनियम

ब्रिटेन की संसद द्वारा 1892 ई. में पारित किये गए अधिनियम ने विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि कर उन्हें सशक्त बनाया, जिसने भारत में संसदीय प्रणाली की आधारशिला रखी| इस अधिनियम द्वारा परिषद् के सदस्यों को वार्षिक वित्तीय विवरण अर्थात बजट पर बहस करने का अधिकार प्रदान किया गया| गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 16 तक कर दी गयी| इस अधिनियम द्वारा भारत में पहली बार चुनाव प्रणाली की शुरुआत की गयी|

रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773

बंगाल के कुप्रशासन से उपजी परिस्थितियों ने ब्रिटिश संसद को ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों की जाँच हेतु बाध्य कर दिया| ब्रिटिश संसद ने पाया कि भारत में कंपनी की गतिविधियों को नियंत्रित करने की जरुरत है और इसी जरुरत की पूर्ति के लिए 1773 ई. में रेग्युलेटिंग एक्ट पारित किया गया| यह एक्ट भारत के सम्बन्ध प्रत्यक्ष हस्तक्षेप हेतु ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाया गया पहला कदम था |इस एक्ट का उद्देश्य व्यापारिक कंपनी के हाथों से राजनीतिक शक्ति छीनने की ओर एक कदम बढाना था|

चार्टर अधिनियम,1793

1793 ई. में पारित चार्टर अधिनियम द्वारा कंपनी के भारत के साथ व्यापारिक एकाधिकार को अगले बीस वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया और गवर्नर जनरल के अधिकार क्षेत्र में बम्बई और मद्रास के गवर्नर को भी शामिल कर दिया |सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को खुले सागर तक बढ़ा दिया |इस अधिनियम के द्वारा ब्रिटिशों ने भारत पर शासन करने के विस्तारवादी नीति पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया और भारतीय लोगों के अधिकारों व संपत्ति को भी नियंत्रित करने लगे तथा न्यायालयों को अपने निर्णयों को स्वयं द्वारा निर्मित सामान्य संहिता के आधार पर नियंत्रित करने के लिए बाध्य किया|

1853 ई. का चार्टर अधिनियम

1853 ई. का चार्टर एक्ट, 1852 ई.  की सेलेक्ट कमेटी की जाँच रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया था| राजा राममोहन राय की इंलैंड यात्रा  और बॉम्बे एसोसिएशन व मद्रास नेटिव एसोसिएशन की याचिकाओं का परिणाम 1853 ई. का चार्टर एक्ट था| इस अधिनियम द्वारा भारतीय (केंद्रीय) विधान परिषद् में सर्वप्रथम क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया|गवर्नर जनरल की परिषद् में मद्रास,बॉम्बे, बंगाल और आगरा की स्थानीय (प्रांतीय) सरकारों द्वारा छह नए विधान परिषद् के सदस्य नियुक्त किये गए|

1858 ई. का भारत सरकार अधिनियम

अगस्त 1858 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित कर भारत में कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया| इस अधिनियम द्वारा भारत के शासन का नियंत्रण ब्रिटिश सम्राट को सौंप दिया गया| यह 1857 के विद्रोह का परिणाम था | इस उद्घोषणा द्वारा भारत के लोगों को यह आश्वासन दिया गया कि जाति,रंग व प्रजाति आदि के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा| इस अधिनियम द्वारा  भारत के गवर्नर जनरल को वायसराय, जिसका अर्थ था-सम्राट का प्रतिनिधि, कहा जाने लगा|

1833 ई. का चार्टर अधिनियम

1833 ई. का चार्टर अधिनियम इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति का परिणाम था ताकि इंग्लैंड में मुक्त व्यापार नीति के आधार पर बड़ी मात्रा में उत्पादित माल हेतु बाज़ार के रूप में भारत का उपयोग किया जा सके| अतः 1833 का चार्टर अधिनियम उदारवादी संकल्पना के आधार पर तैयार किया गया था| इस अधिनियम द्वारा बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा| लॉर्ड विलियम बेंटिक को “ब्रिटिश भारत का प्रथम गवर्नर जनरल” बनाया गया|

1813 का चार्टर अधिनियम

लम्बे समय तक चले नैपोलियन युद्ध और महाद्वीपीय प्रणाली के क्रियान्वयन के कारण .ब्रिटिश व्यापार में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गयी| दूसरी ओर, ब्रिटिश व्यापारी लगातार कंपनी-व्यापार को सभी निजी व्यापारियों हेतु खोलने की मांग कर रहे थे| अतः उनकी मांगों को पूरा करने के लिए 1813 का चार्टर अधिनियम (1813 ई. का ईस्ट इंडिया कंपनी अधिनियम) पारित किया गया | यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक ऐसा अधिनियम था जिसने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को जारी रखा|

पिट्स इंडिया एक्ट 1784

1773 ई. के रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने और कंपनी के भारतीय क्षेत्रों के प्रशासन को अधिक सक्षम और उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने के लिये अगले एक दशक के दौरान जाँच के कई दौर चले और ब्रिटिश संसद द्वारा अनेक कदम उठाये गए| इनमें सबसे महत्पूर्ण कदम 1784 ई. में पिट्स इंडिया एक्ट को पारित किया जाना था| यह एक्ट इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है कि इसने कंपनी की गतिविधियों और प्रशासन के सम्बन्ध में ब्रिटिश सरकार को सर्वोच्च नियंत्रण शक्ति प्रदान कर दी | यह पहला अवसर था जब कंपनी के अधीन क्षेत्रों को ब्रिटेन के अधीन क्षेत्र कहा गया|

व्यपगत का सिद्धांत

व्यपगत का सिद्धांत एक साम्राज्यवाद समर्थक उपागम था जिसका उद्देश्य भारत में ब्रिटिश राज्यक्षेत्र का विस्तार करना था| इस सिद्धांत का प्रारंभ लॉर्ड डलहौजी द्वारा किया गया था| इस सिद्धांत के अनुसार वे राज्य, जिनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था, अपने शासन करने के अधिकार खो देते थे |साथ ही उत्तराधिकारी को गोद लेने पर भी उनके राज्य वापस प्राप्त नहीं किया जा सकता था| सतारा(1848 ई.) जयपुर(1849 ई.) संभलपुर(1849 ई.) बाहत(1850 ई.) उदयपुर(1852 झाँसी(1853 ई.) नागपुर(1854 ई.) ऐसे भारतीय राज्य थे जिनका डलहौजी द्वारा व्यपगत के सिद्धांत के आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया गया था|

सहायक संधि

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने हस्तक्षेप की नीति को प्रारंभ किया और और पूर्व में अपने अधीन किये गये शासकों के क्षेत्रों का प्रयोग अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं अर्थात भारतीय राज्यों को ब्रिटिश शक्ति के अधीन लाने के लिए किया| सहायक संधि हस्तक्षेप की नीति थी जिसका प्रयोग भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली (1798-1805 ई.) द्वारा भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के लिए किया गया| इस प्रणाली में यह कहा गया की प्रत्येक भारतीय शासक को अपने राज्य में ब्रिटिश सेना के रख-रखाव और अपने विरोधियों से  सुरक्षा के बदले में धन का भुगतान करना होगा|

बक्सर की लड़ाई

बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब मीर कासिम,अवध के नवाब सुजाउद्दौला व मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया था | यही वह निर्णायक युद्ध था जिसने अंग्रेजों को अगले दो सौ वर्षों के लिए भारत के शासक के रूप में स्थापित कर दिया| यह युद्ध अंग्रेजों द्वारा फरमान और दस्तक के दुरुपयोग और उनकी विस्तारवादी व्यापारिक आकांक्षाओं का परिणाम था| अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के बीच लड़े  गए कर्नाटक युद्ध ,प्लासी के युद्ध और बक्सर के युद्ध ने भारत में ब्रिटिश सफलता के दौर को प्रारंभ कर दिया|

जैन धर्म

जैन को जीन के अनुयायी के तौर पर परिभाषित किया जाता है | जीन का अर्थ है विजेता | जैन धर्म बौद्ध धर्म से कई सदी पहले शुरू हो गया था परंतु बाद में महावीर के द्वारा इसे पुनर्जीवित किया गया, जोकि 24वें तीर्थंकार थे| जैन सिद्धांतों के अनुसार, जैन धर्म सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है जिसकी ना ही शुरुआत है और ना ही अंत है |

बौद्ध विद्वान

बौद्ध शिक्षाओं का मुख्य उद्देश्य व्यति के मोक्ष या निर्वाण को सुरक्षित रखना था | बौद्ध धर्म ने औरतों व शूद्र के लिए दरवाजे खोल कर समाज मे एक नया महत्वपूर्ण प्रभाव डाला | बौद्ध धर्म ने लोगों को किसी भी चीज़ को हल्के में न लेने के लिए सिखाया बल्कि बहस और योग्यता के आधार पर न्याय करना सिखाया | बौद्ध धर्म ने लोगों के बीच राष्ट्रीयता का प्रचार किया | बौद्ध भिक्षुओं ने पालि को संस्कृत के साथ मिलाकर एक नई भाषा का निर्माण किया जिसे संकर संस्कृत कहा गया |

राजपूत वंश के दौरान सामाजिक और सांस्कृतिक विकास

‘राजपूत’ शब्द संस्कृत के ‘राज-पुत्र’ शब्द से लिया गया है जिसका मतलब “एक राजा का पुत्र” होता है। राजपूत अपने साहस, ईमानदारी और राजशाही के लिए जाने जाते थे ।ये वो योद्धा थे जो युद्ध मे लड़े और प्रशासनिक क्रियाओं का भी ध्यान रखा। राजपूतों का उदय पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सो से हुआ था। छठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक राजपूत विख्यात थे। राजपूतों ने बीसवीं शताब्दी तक राजस्थान और सौराष्ट्र के शानदार राज्यों मे पूर्ण बहुमत मे शासन किया।

सल्तनत काल के दौरान छोटे राज्य

सल्तनत काल के प्रारम्भ मे उत्तराधिकार का कोई निश्चित कानून नहीं था । आंतरिक नागरिक युद्ध देश को छोटे छोटे शहरो मे विभाजित कर रहा था। प्रत्येक सुल्तान की मृत्यु के बाद उत्पन्न परिस्थिति ने कई नागरिक युद्धो को जन्म दिया। श्रेष्ठ बनने की होड़ मे, तैमूर और बाबर के आक्रमण दिल्ली सल्तनत के पतन के मुख्य कारण बने। साम्राज्य के इस तरह से पतन होने की वजह से देश के विभिन्न भागो मे कई छोटे राज्यों का उदय हुआ।

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